जगद्गुरु आदि शंकराचार्य: हिंदू धर्म के सशक्त मार्गदर्शक की जन्म जयंती पर विशेष

0
44
जगद्गुरु

भारत के महान संत और दार्शनिक, हिंदू धर्म के ध्वजा वाहक जगद्गुरु भगवान आदि शंकराचार्य की आज जयंती है  जिसे शंकर जयंती के नाम से जाना जाता है, आज के पोस्ट में हम आदि शंकराचार्य के जीवन से जुड़े अनेक प्रसंगो एवं उनके सिद्धांतों का उल्लेख करने का प्रयास करेगे

Content Table

1.परिचय

i.आदि शंकराचार्य का संक्षिप्त अवलोकन

कलियुग के प्रथम चरण में प्राय विलुप्त प्राय वैदिक ज्ञान को अपने विचारों से विशुद्ध कर दार्शनिक एवं वैज्ञानिक आधार देकर समृद्ध करने वाले भारत के चारो कोनो में चार मठों के संस्थापक शिवस्वरुप भगवत्पाद शंकराचार्य सदैव अनुकरण करने योग्य है

हिंदू धर्म में आदि गुरु शंकराचार्य का सर्वोच्च स्थान है जब भारत में हिंदू धर्म को सिद्धांतों का भ्रम फेलाकर समाप्त करने का प्रयास किया गया और अनेक नये पंथ जैन, बौद्ध आदि सक्रिय हुए तब हिंदू धर्म की पुनर्स्थापना के लिए आदि शंकराचार्य का जन्म हुआ

अपने 32 वर्ष के अल्प जीवन काल में आदि शंकर ने अनेक अविश्वसनीय कार्य किए धर्म को मजबूत आधार प्रदान किया, नकली संप्रदाय और मत को जो हिंदू धर्म से बैरभाव रखते थे उन्हें समाप्त किया

आदि शंकर महान दार्शनिक और अदभुत मेधा सम्पन्न थे इन्होने अद्वैत वेदांत पर विलक्षण टीका लिखी श्रीमद्भगवद्गीता, उपनिषद और वेदांत सूत्र पर लिखी टीका को आज भी सर्वश्रेष्ठ टीका माना जाता है

भारत के चारों कोनो में स्थापित चार मठ को धर्म की सर्वोच्च सत्ता के रूप में मान्यता प्राप्त है चारों मठ के प्रमुखों को शंकराचार्य नाम से सम्बोधित किया जाता है

आदि शंकर को भगवान शंकर का अवतार माना जाता है, इनके ब्रह्मसूत्र पर लिखी व्याख्या को विदुत्ता की सीमा माना जाता है शास्त्रार्थ में मतभेद होने पर आदि शंकर के लिखी टीकाओ और व्याख्याओं को प्रमाण माना जाता है

आदि शंकराचार्य

ii.भारतीय दर्शन और अध्यात्म में उनके योगदान का महत्व

आदि शंकराचार्य को सनातन धर्म की पुन: स्थापना का गौरव प्राप्त है, उनका जन्म ऐसे समय में हुआ जब हिंदू धर्म का दार्शनिक आधार कमजोर हो चुका था और सामान्य जनता में मूर्ति पूजा को पाखंड माना जाने लगा था

उन्होंने हिंदू धर्म और मूर्ति पूजा पर लगे सभी प्रश्नो और भ्रमो के उत्तर देकर उसे नया जीवन देने का कार्य किया और मूर्ति पूजा का विरोध करने वालों को प्रमाणिक उत्तर देकर फिर से स्थापित किया

2.प्रारंभिक जीवन और पृष्ठभूमि

i.जन्म और पालन-पोषण

आदि शंकर का जन्म केरल के कालड़ी गांव में 507 ई पूर्व हुआ था पिता शिवगुरु ने शिव अराधना करके इन्हें पुत्र रूप में पाया था इसलिए इनका नाम शंकर रखा गया। शंकर जन्म से ही प्रतिभासम्पन्न थे, कम उम्र में ही पिता के देहांत के बाद इन्होने माता से संन्यास लेने की अनुमति मांगी।

ये कितने गुणी थे इसका ये प्रमाण है कि 6 साल की उम्र में ही ये संपूर्ण शास्त्र के विद्वान हो गए। मां से संन्यास की अनुमति मिलने पर गोविंदनाथ से संन्यास की दीक्षा ली इन्हे भगवान शंकर का अवतार माना जाता है भगवान शंकर के रूप में इनके जन्म के शास्त्रीय प्रमाण भी मिलते हैं।

व्याकुर्वन् व्याससूत्रार्थं श्रुतेरर्थं यथोचिवान l

श्रुतेर्न्यायः स एवार्थः शंकरः सविताननः ll

अर्थ: सूर्य के समान प्रतापी श्री शिवावतार आचार्य शंकर श्री वादरायण वेदव्यास रचित ब्रह्मसूत्रों पर श्रुति सम्मत युक्ति से पूर्ण भाष्य की रचना करते हैं।

ii.शिक्षा एवं आध्यात्मिक यात्रा

आदि शंकराचार्य शिव के अवतार थे इसीलिये वे बचपन से ही मेधावी थे केवल 8 वर्ष की आयु में वेदों में पारंगत हो गए 12 वर्ष की आयु में सभी शास्त्रों में निपुण हो गए 16 वर्ष की आयु में ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखा और 32 वर्ष की आयु में शरीर त्याग दिया।

8 वर्ष की आयु गोविंदनाथ से संन्यास की दीक्षा ग्रहण की, 16 वर्ष की अवस्था में बद्रिकाश्रम में ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखा, आदि शंकर ने अपने 32 वर्ष की अल्पायु में बहुत आश्चर्यजनक कार्य किया जो एक साधारण मनुष्य के लिए सोचना भी असंभव है।

आदि शंकर ने संन्यास लेने के बाद संपूर्ण भारत में पेडल घूमकर अद्वैत वेदांत का प्रचार किया, दरभंगा बिहार जाकर मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ करके उसे परास्त किया और संन्यास दीक्षा दी, उस समय भारत में बहुत सी कुरितियां प्रचलित थी आदि शंकर ने उन सबको समाप्त किया और समभावदर्शी धर्म की स्थापना की, दशनाम गोस्वामी समाज की स्थापना की।

दशनाम संन्यास के 10 सरनेम होते हैं जो सन्यासी के गुरुप्रदत्त नाम के बाद लगाया जाता है जिससे संन्यासी के संप्रदाय का ज्ञान होता है ये दशनाम है सरस्वती गिरि, पुरी, बन, भारती, तीर्थ, सागर, अरण्य,, पर्वत और आश्रम, आदि शंकर ने इन दशनाम गोस्वामी को हिंदू धर्मगुरु के रूप में अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया और धर्म प्रचार का कार्य सोपा।

आदि शंकर ने भाष्य, प्रकरण एवं स्तोत्रग्रंथों की रचना करके हिंदू धर्म विरोधियो को शास्त्रार्थ के लिए ललकारा। नारदकुंड से अर्चाविग्रह श्री बद्रीनाथ को प्रकट किया और भूगर्भ से अर्चाविग्रह श्रीजगन्नाथ दारुब्रह्म को प्रकट किया एवं कठिन परिश्रम करते हुए चार मठो की स्थापना की आदि शंकर ने नीति शास्त्र, उपासना एवं ज्ञानकांड का धर्माचार्यो से प्रचार प्रसार करवाया।

शंकराचार्य ने संपूर्ण भारत में शक्तिपीठों की स्थापना की, नील पर्वत पर स्थित माता चंडी देवी मंदिर की स्थापना की शिवालिक पर्वत श्रृंखला में माता शाकंभरी देवी की पूजा अर्चना की, आसाम में स्थित कामाक्षी देवी मंदिर की स्थापना भी आदि शंकर ने की।

इस प्रकार आदि शंकर ने धर्म का खूब प्रचार प्रसार करवाया, मात्र 32 वर्ष की अल्प आयु में केदारनाथ में संबत 475 ई पूर्व आदि शंकर ने प्रथ्वीलोक को छोड़ दिया।

3.आदि शंकराचार्य का दार्शनिक योगदान

i.आदि शंकराचार्य का अद्वैत वेदांत

आदि शंकर ने बहुत कम समय में सनातन हिंदू धर्म का मार्गदर्शन किया आदि शंकर के अनुसार ज्ञान दो प्रकार का होता है परा विद्या और अपराविद्या सगुण ब्रह्म ही परा विद्या है और निर्गुण ब्रह्म ही अपरा विद्या है।

आदि शंकर के अनुसार ब्रह्म और जीव तत्वतः और मूलतः एक ही है इनमे भेद देखना ही अविद्या है, जीव की मुक्ति ज्ञान के बिना संभव नहीं है, जीव की मुक्ति ब्रह्म में लीन हो जाने पर होती है।

ii.अद्वैत वेदांत: मूल सिद्धांत और शिक्षाएँ

आदि शंकर ने अद्वैत वेदांत के सिद्धांत का प्रतिपादन किया “ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या जीवो ब्रह्मैब नापरः” आदि शंकर केवल ब्रह्म को सत्य मानते हैं, जीव भ्रमवश ही संसार को सत्य मानता है जबकी संसार केवल कल्पना मात्र है।

अद्वैत सिद्धांत के प्रतिपादक आदि शंकर को माना जाता है ब्रह्म सूत्र के भाष्य में शंकर ”अहम ब्रह्मास्मि” सूत्र से अद्वैत सिद्धांत को प्रस्तुत करते हैं जिसके अनुसार जीव और ब्रह्म अलग नहीं है, अज्ञान वश जीव ब्रह्म को पहचान नहीं पाता है पहचान लेने पर जीव ब्रह्म ही हो जाता है। आदि शंकर के अनुसार अद्वैत सिद्धांत से संपूर्ण सृष्टि बंधी हुई है। अद्वैत वेदांत, वेदांत की एक शाखा है।

iii.आदि शंकराचार्य के आलोचक और विवाद

आदि शंकर का बौद्ध धर्म के साथ-साथ अपने समय के सभी विधर्मी विचारधारा वाले लोगों से विवाद हुआ और अपने अकाट्य तर्कों से सभी विरोधियो को शास्त्रार्थ में पराजित किया अपने शास्त्र सम्मत तर्को से आदि शंकर ने शेब वैष्णवों के विचारों को नष्ट कर दिया।

उनका ईश्वर को ना मानने वाले बौद्ध धर्म और अन्य पंथों ने विरोध किया। उन्होंने रुधिवादी हिंदू और गैर हिंदू परंपरा दोनों से तर्क वितर्क के माध्यम् से अपने सिद्धांत का प्रचार करने के उद्देश्य से संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप की यात्रा की और सभी को अपने दर्शन सिद्धांत और विचारो से पराजित किया।

4.मठ की स्थापना

i.चार शंकराचार्य मठों की स्थापना 

आदि शंकर ने भारत के चारों कोनों पर चार आध्यात्मिक मठों की स्थापना की

  • दक्षिण में श्रगेरी शंकराचार्यपीठ
  • पूर्व में जगन्नाथ पुरी में गोवर्धन पीठ
  • पश्चिम में द्वारका में शारदा मठ
  • उत्तर में बद्रिकाश्रम में ज्योतिर्मठ

ii.विरासत को संरक्षित करने में इन संस्थानों का महत्व

आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चारों मठ वर्तमान शंकराचार्य के नेतृत्व में सनातन परंपरा का प्रचार प्रसार  कर रहे हैं, धर्म से संबंधित कोई विवाद होने पर ये चारों मठ समाज और राष्ट्र का मार्गदर्शन करते हैं।

आदि शंकर ने अपने 32 वर्ष के जीवन काल में 116 रचनाओ का निर्माण किया जिनमें 10 उपनिषदो पर लिखे भाष्य, स्तुति ग्रंथ भगवद्गीता पर लिखी टीका आदि सभी, भारत और आध्यात्मिक जगत के लिए अंधकार में सूर्य की रोशनी के समान है।

शंकराचार्य ने ज्ञान के लिये भक्ति को अनिवार्य बताया था और भक्ति प्राप्त करने का फल ज्ञान है ऐसा आदि शंकर ने निर्देश किया, उनके लिखे सभी ग्रंथ और चारों मठ हिंदू समाज के लिए युगो युगो तक आध्यात्मिक उन्नति का पथ प्रशस्त करते रहेंगे।

5.आदि शंकराचार्य का प्रभाव और विरास

i.अद्वैत वेदांत का प्रसार और उसका प्रभाव

आदि शंकर ने अद्वैत वेदांत का सिद्धांत भारत को दिया, अद्वैत, वेदांत का एक भाग है, जो वेदों का अंतिम उपदेश है वही वेदांत है, वेदों का अंतिम उपदेश उपनिषद है, अद्वैत उपनिषद पर आधारित ज्ञान है जो जीव और ब्रह्म की एकता का प्रतिपादन करता है।

अद्वैत, वेदांत के छोटे-छोटे सूत्र देता है जिन पर विचार करके जीव ब्रह्म को जान सकता है, ‘ब्रह्म सत्यम जगन्मिथ्या‘,’अहम् ब्रह्मास्मि‘, ‘एको ब्रह्मास्मि‘ सूत्र ब्रह्म और जीव की एकता की ओर संकेत करते है।

जहां द्वैत नहीं है वही अद्वैत है इसी सिद्धांत को आदि शंकर ने पूरे भारत में घूमकर इसका उपदेश दिया, भारत में आध्यात्मिक जगत में सबसे ऊंचा और कठिन सिद्धांत अद्वैत वेदांत को माना जाता है।

ii.आदि शंकराचार्य का भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म पर स्थिर प्रभाव

आदि शंकर ने अपनी जीवन यात्रा में ज्ञान और भक्ति दोनों पर ही प्रमुखता से लिया, भक्ति और ज्ञान दोनों को एक दूसरे का उदाहरण बताया और एक के अनुभव से दूसरे की प्राप्ति को बताया। भारत भक्ति प्रधान देश है यहां हर गली में मंदिर स्थापित है जहां मूर्ति पूजा होती है और आदी शंकर के अनुसार मूर्ति में सगुण ब्रह्म का वास होता है इसलिए हिंदू धर्म सगुण ब्रह्म उपासक है।

आदि शंकर ने मूर्ति पूजा को जरूरी बताया। उनके अनुसार सगुण ब्रह्म से निर्गुण ब्रह्म की प्राप्ति होती है जोकी अद्वैत वेदांत का मूल वाक्य है। आदि शंकर के रचे हुए स्तोत्र का पाठ भारत में हर मंदिर और विशेष अनुष्ठान के समय किया जाता है। आदि शंकर के सिद्धांत का भारत और हिंदू संस्कृति पर गहन प्रभाव है।

आदि शंकर जिन्हे जगद्गुरु शंकराचार्य भी कहा जाता है उनका जन्म ऐसे समय हुआ जब हिंदू धर्म भ्रमित था और बौद्ध धर्म का बोल बाला था, मूर्ति पूजा से विश्वास समाप्त हो चुका था, उस समय आदि शंकर ने हिंदुओं को मूर्ति पूजा के लिए सजग किया।

आदि शंकराचार्य जयंती हर वर्ष वैशाख माह की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाती है, आज 12 मई 2024 दिन रविवर को जगद्गुरु शंकराचार्य जी की 1236वीं वर्षगाँठ मनाई जा रही है।

6.आदि शंकराचार्य की विश्व प्रसिद्ध रचनाएँ

आदिशंकराचार्य ने अनेक रचनाएँ लिखीं जो मूलतःअद्वैत वेदांत का आधार मानी जाती हैं। उनकी रचनाओं को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है-

  • भाष्य
  • प्रकरण ग्रंथ
  • स्तोत्र

भाष्य: आदि शंकराचार्य के विभिन्न ग्रंथों पर लिखे गए भाष्य मिलते हैं, जिन्‍हें मुख्यतः उपनिषदों पर लिखा गया है, उनके उपनिषदों पर लिखे गए भाष्य को प्रमाणिक माना जाता है, मुख्य कृतियों का नीचे उल्‍लेख किया जा रहा है-

ब्रह्मसूत्र पर लिखा गया ब्रह्मसूत्रभाष्य उनका सबसे प्रसिद्ध भाष्य है

अत्रेय उपनिषद

वृहदारण्यक उपनिषद

केनोपनिषद (सामवेद)

ईश उपनिषद (शुक्ल यजुर्वेद)

भगवद्गीता

विष्णुसहस्त्रनाम

प्रकरण ग्रंथ: आदि शंकर ने विश्व प्रसिद्ध प्रकारण ग्रंथ लिखे हैं जिनमें

विवेक चूणामणि

आत्मबोध

अपरोक्षानुभूति

शतश्लोकी

उपदेशसाहस्त्री मुख्य है

स्तोत्र: ग्रंथों में आदि शंकराचार्य ने विभिन्न स्तुतियां लिखी हैं जिन मै, गणेश स्तुति, शिव स्तुति, शक्ति स्तुति, विष्णु स्तुति  है, मुख्य स्तुति ग्रंथों में-

महिषासुरमर्दनी स्तोत्र, आनंदलहरी, कनकधारा स्तोत्र आदि हैं।

सामान्य प्रश्न

प्रश्न:आदि शंकराचार्य क्यों प्रसिद्ध है?

उत्तर: प्राचीन भारतीय सनातन परंपरा के विकास और धर्म के प्रचार प्रसार में आदि शंकराचार्य का महान योगदान है। उन्होनें सनातन परंपरा को पूरे देश में फैलाया है भारत के चरणों कोनो में चार मठों की स्थापना की।आदि शंकराचार्य अद्वैत वेदांत के अग्रणी दूत,संस्कृत के परम विद्वान, उपनिषद के भाष्यकार और धर्म सुधारक थे।

प्रश्न: आदि शंकराचार्य के दर्शन का मूल क्या है?

उत्तर:आदि शंकराचार्य के दर्शन का मूल एकात्मता है। उनके द्वारा जितने भी ग्रंथ रचे गए सभी का आधार एकात्मता है आदि शंकर की आध्यात्मिक दिग्विजय यात्रा का उद्देश्य किसी धर्म या संप्रदाय का विरोध करना नहीं था। बल्की भारतीय जीवन मूल्यों, हिंदू धर्म, मत और संप्रदायों में आई विसंगतियों को दूर कर धर्म की पुनर्स्थापना करना था।

इन्हें भी पढ़े

अयोध्या में रामलला का पहला सूर्यतिलक: जाने किस तकनीक से संभव हो पाई विशेष घटना, पूरी जानकारी !

आपको पोस्ट जगद्गुरु आदि शंकराचार्य में आदि शंकराचार्य से संबंधित सभी जानकारी उपलब्ध कराई गयी है यदि आपको जानकारी उपयोगी लगी हो तो इसे अपने मित्र मंडली में साझा करें और टिप्पणी करें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here